कभी रो कर समझौता कर लिया... तो कभी हंस कर ख्वाहिशों को मार गए... लोग समझते रहें, हमें कद्र नहीं रिश्तों की... और हम रिश्ते बचाते-बचाते ख़ुद से ही हार गए....
तू अपनी खूबियां ढूंढ .... कमियां निकालने के लिए लोग हैं | अगर रखना ही है कदम.... तो आगे रख , पीछे खींचने के लिए लोग हैं | सपने देखने ही है ..... तो ऊंचे देख , निचा दिखाने के लिए लोग हैं | अपने अं...
● हम वो आखरी पीढ़ी हैं - जिन्होंने कई-कई बार मिटटी के घरों में बैठ कर परियों और राजाओं की कहानियां सुनीं, जमीन पर बैठ कर खाना खाया है, प्लेट में चाय पी है। ● हम वो आखरी लोग हैं - जिन्होंने बचपन में मोहल्ले के मैदानों में अपने दोस्तों के साथ पम्परागत खेल, गिल्ली-डंडा, छुपा-छिपी, खो-खो, कबड्डी, कंचे जैसे खेल खेले हैं। ● हम वो आखरी पीढ़ी के लोग हैं - जिन्होंने कम या बल्ब की पीली रोशनी में होम वर्क किया है और नावेल पढ़े हैं। ● हम वही पीढ़ी के लोग हैं - जिन्होंने अपनों के लिए अपने जज़्बात, खतों में आदान प्रदान किये हैं। ● हम वो आखरी पीढ़ी के लोग हैं - जिन्होंने कूलर, एसी या हीटर के बिना ही बचपन गुज़ारा है। ● हम वो आखरी लोग हैं - जो अक्सर अपने छोटे बालों में, सरसों का ज्यादा तेल लगा कर, स्कूल और शादियों में जाया करते थे। ● हम वो आखरी पीढ़ी के लोग हैं - जिन्होंने स्याही वाली दावात या पेन से कॉपी, किताबें, कपडे और हाथ काले, नीले किये है। ● हम वो आखरी लोग हैं - जिन्होंने टीचर्स से मार खाई है। ● हम वो आखरी लोग हैं - जो मोहल्ले के बुज़ुर्गों को ...
“रिश्ते जताने लोग मेरे घर भी आयेंगे फल आये हैं तो पेड़ पे पत्थर भी आयेंगे, जब चल पड़े हो सफ़र को तो फिर हौसला रखो सहरा कहीं, कहीं पे समंदर भी आयेंगे, कितना गुरुर था उसे अपनी उड़...
Comments
Post a Comment