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मिट्टी वाले दीये जलाना..अबकी बार दीवाली में..

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राष्ट्रहित का गला घोंटकर,                      छेद न करना थाली में... मिट्टी वाले दीये जलाना,                     अबकी बार दीवाली में... देश के धन को देश में रखना,                       नहीं बहाना नाली में.. मिट्टी वाले दीये जलाना,                    अबकी बार दीवाली में... बने जो अपनी मिट्टी से,                    वो दिये बिकें बाज़ारों में... छुपी है वैज्ञानिकता अपने,                      सभी तीज़-त्यौहारों में... चायनिज़ झालर से आकर्षित,                      कीट-पतंगे आते हैं... जबकि दीये में जलकर,                 बरसाती कीड़े मर जाते हैं... कार्तिक दीप-दान से बदले, ...

कैसे कहे कुछ बातें ऐसी है

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कैसे कहे कुछ बातें ऐसी है कुछ एहसास तुम्हारे है  और कुछ ख्वाहिशें मेरी थी.. कुछ अरमान तुम्हारे थे कुछ उलझने थी मेरी. कुछ फासले तुम्हारे थे.. कैसे कहे वो राहें मेरी तुम्हारी थी, पर यह इंतजार हमारे थे कुछ भींगी सी पलकें थी मेरी और कुछ आंसू उसमें  तुम्हारे थे..

कितना नादान था मैं ...

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    सपने में अपनी मौत को करीब से देखा.. कफ़न में लिपटे तन और जलते अपने शरीर को देखा.. खड़े थे लोग हाथ बांधे कतार में. कुछ थे.परेशान कुछ उदास थे.और कुछ छुपा रहे अपनी मुस्कान थे. देख रहा था मैं ये सारा मंजर. तभी किसी ने हाथ बढा कर मेरा हाथ थाम लिया और जब देखा चेहरा उसका तो मैं बड़ा हैरान था. हाथ थामने वाला कोई और नही मेरा भगवान था. चेहरे पर मुस्कान और नंगे पाँव थे जब देखा मैंने उन की तरफ जिज्ञासा भरी नज़रों से. तो हँस कर बोला-तूने हर दिन दो घडी जपा मेरा नाम था. आज उसी का क़र्ज़ चुकाने आया हूँ. रो दिया मै अपनी बेवक़ूफ़ियों पर ये सोच कर. जिसको दो घडी जपा वो बचाने आये हैं और जिनमें हर घडी रमा रहा वो शम शान पहुचाने आये है. तभी खुली आँख मेरी, बिस्तर पर विराजमान था. कितना नादान था मैं हकीकत से अनजान था....

खुद को गिरा कर रिश्ता बचा रहे थे हम..

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खुद को गिरा कर रिश्ता बचा रहे थे हम.. मोहब्बत उसे भी है खुद को बता रहे थे हम... लौट आयेगी वापस तो लिपट कर रोएंगे दोनो.. खुद से फरेब बा-खुदी निभा रहे थे हम... खास जरूरत नहीं थी उसको मेरी फिर भी... बिन बुलाए ही वापस जा रहे थे हम... उसका जिक्र हुआ तो किस्सा सुना रहे थे हम... उस किस्से में भी उसको अपना बता रहे थे हम... वक्त रहते खुद को आइना दिखा रहे थे हम... कागज पर नाम लिख उसका खुद ही मिटा रहे थे हम...

मैं जिंदगी हू ...

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🍃🍂🍃🍂🍃🍂🍃🍂🍃🍂🍃🍂 मैंने कल एक झलक जिंदगी को देखा, वो मेरी राह में गुनगुना रही थी ...  मैं ढूंढ़ रहा था उसे इधर उधर, वो ऑंख मिचोली कर मुस्कुरा रही थी ...  एक अरसे के बाद आया मुझे करार, वो थपकी दे मुझे सुला रही थी ...  हम दोनों क्यों ख़फा हैं एक दुसरे से, मैं उसे और वो मुझे बता रही थी ... मैंने पुछा तूने मुझे इतना दर्द क्यों दिया ?  उसने कहाँ मैं जिंदगी हू ... "तुजे जीना सीखा रही थी" 🍃🍂🍃🍂🍃🍂🍃🍂🍃🍂🍃🍂

जिन्हें अपने घरों में बच्चियां अच्छी नहीं लगती...

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🍃🍂🍃🍂🍃🍂🍃🍂🍃🍂🍃🍂 ❛दरवाज़ों पे खाली तख्तियां अच्छी नहीं लगती,  मुझे उजड़ी हुई ये बस्तियां अच्छी नहीं लगती ! चलती तो समंदर का भी सीना चीर सकती थीं,  यूँ साहिल पे ठहरी कश्तियां अच्छी नहीं लगती ! खुदा भी याद आता है ज़रूरत पे यहां सबको,  दुनिया की यही खुदगर्ज़ियां अच्छी नहीं लगती ! उन्हें  कैसे  मिलेगी  माँ  के  पैरों  के तले  जन्नत,  जिन्हें अपने घरों में बच्चियां अच्छी नहीं लगती !❜ 🍃🍂🍃🍂🍃🍂🍃🍂🍃🍂🍃🍂🍃🍂🍃🍂

बस इसी का नाम ज़िन्दगी है ....

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कुछ दबी हुई ख़्वाहिशें है, कुछ मंद मुस्कुराहटें... कुछ खोए हुए सपने है, कुछ अनसुनी आहटें... कुछ दर्द भरे लम्हे है, कुछ सुकून भरे लम्हात... कुछ थमे हुए तूफ़ाँ हैं, कुछ मद्धम सी बरसात... कुछ अनकहे अल्फ़ाज़ हैं, कुछ नासमझ इशारे... कुछ ऐसे मंझधार हैं, जिनके मिलते नहीं किनारे... कुछ उलझनें है राहों में, कुछ कोशिशें बेहिसाब.... बस इसी का नाम ज़िन्दगी है चलते रहिये, जनाब...

ऐ मेरे दोस्त तू आँसू बहाता क्यों है....

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ऐ मेरे दोस्त तू आँसू बहाता क्यों है,  जहाँ तेरी कद्र ना हो उस गली जाता क्यों है?   तू खुद ही ज़िम्मेदार है अपनी रुसवाई का,  आखिर ग़ैरों की बातों में आता क्यों है?  कड़वा ही सही मगर सच बोलना सीख,  बेमतलब यूं बहाने बनाता क्यों है?  तू तो कहता है कि तू हमदर्द है मेरा,   मदद करके फिर एहसान जताता क्यों है?  जब ग़म-ए-मोहब्बत से परहेज़ ही करना है,  तो ख़ामख़ाह किसी से दिल लगाता क्यों है?  इन्हें तो बस मज़ा लेने में मज़ा आता है,  ज़माने भर को अपने ज़ख्म दिखाता क्यों है?  अरे कुछ तो सबक लिया कर अपनी गलतियों से,  हर बार वही गलतियां दौहराता क्यों है?  ये लोग जलते हैं तुझे ख़ुश होता देखकर,  यूं बेवजह मुस्कुराकर इन्हें जलाता क्यों है?

मैंने कल एक झलक जिंदगी को देखा....

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🍃🍂🍃🍂🍃🍂🍃🍂🍃🍂🍃🍂 मैंने कल एक झलक जिंदगी को देखा, वो मेरी राह में गुनगुना रही थी ...  मैं ढूंढ़ रहा था उसे इधर उधर, वो ऑंख मिचोली कर मुस्कुरा रही थी ...  एक अरसे के बाद आया मुझे करार, वो थपकी दे मुझे सुला रही थी ...  हम दोनों क्यों ख़फा हैं एक दुसरे से, मैं उसे और वो मुझे बता रही थी ... मैंने पुछा तूने मुझे इतना दर्द क्यों दिया ?  उसने कहाँ मैं जिंदगी हू ... "तुजे जीना सीखा रही थी" 🍃🍂🍃🍂🍃🍂🍃🍂🍃🍂🍃🍂

मनुष्य है ही ऐसा.....

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मनुष्य है ही ऐसा..      लक्ष्य भी है, मंज़र भी है, चुभता मुश्किलों का, खंज़र भी है !!      प्यास भी है, आस भी है, ख्वाबो का उलझा, एहसास भी है !!     रहता भी है, सहता भी है, बनकर दरिया सा, बहता भी है!!     पाता भी है, खोता भी है, लिपट लिपट कर फिर, रोता भी है !!     थकता भी है, चलता भी है, मोम सा दुखों में, पिघलता भी है !!     गिरता भी है, संभलता भी है, सपने फिर से नए, बुनता भी है !!         मनुष्य है ही ऐसा..

जिंदगी क्या है......

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कभी तानों में कटेगी, कभी तारीफों में; ये जिंदगी है यारों, पल पल घटेगी !! पाने को कुछ नहीं, ले जाने को कुछ नहीं; फिर भी क्यों चिंता करते हो, इससे सिर्फ खूबसूरती घटेगी, ये जिंदगी है यारों पल-पल घटेगी! बार बार रफू करता रहता हूँ, ..जिन्दगी की जेब !! कम्बखत फिर भी, निकल जाते हैं..., खुशियों के कुछ लम्हें !! ज़िन्दगी में सारा झगड़ा ही... ख़्वाहिशों का है !! ना तो किसी को गम चाहिए, ना ही किसी को कम चाहिए !! खटखटाते रहिए दरवाजा... एक दूसरे के मन का; मुलाकातें ना सही, आहटें आती रहनी चाहिए !! उड़ जाएंगे एक दिन ... तस्वीर से रंगों की तरह ! हम वक्त की टहनी पर..... बेठे हैं परिंदों की तरह !! बोली बता देती है,इंसान कैसा है! बहस बता देती है, ज्ञान कैसा है! घमण्ड बता देता है, कितना पैसा है। संस्कार बता देते है, परिवार कैसा है !! ना राज़ है... "ज़िन्दगी", ना नाराज़ है... "ज़िन्दगी"; बस जो है, वो आज है, ज़िन्दगी! जीवन की किताबों पर, बेशक नया कवर चढ़ाइये; पर...बिखरे पन्नों को, पहले प्यार से चिपकाइये !!

चाय सिर्फ़ चाय ही नहीं होती...

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चाय सिर्फ़ चाय ही नहीं होती... ✍🏻 जब कोई पूछता है "चाय पियेंगे" तो बस नहीं पूछता वो तुमसे दूध, चीनी और चायपत्ती को उबालकर बनी हुई  एक कप चाय के लिए।✍🏻 वो पूछता हैं... क्या आप बांटना चाहेंगे कुछ चीनी सी मीठी यादें कुछ चायपत्ती सी कड़वी दुःख भरी बातें..!✍🏻 वो पूछता है.. क्या आप चाहेंगे बाँटना मुझसे अपने कुछ अनुभव, मुझसे कुछ आशाएं कुछ नयी उम्मीदें..?✍🏻 उस एक प्याली चाय के साथ वो बाँटना चाहता है अपनी जिंदगी के वो पल तुमसे जो अनकही है अबतक दास्ताँ जो अनसुनी है अबतक✍🏻 वो कहना चाहता है.. तुमसे तमाम किस्से जो सुना नहीं पाया  अपनों को कभी..✍🏻 एक प्याली चाय के साथ को अपने उन टूटे और खत्म हुए ख्वाबों को एक बार और  जी लेना चाहता है।✍🏻 वो उस गर्म चाय की प्याली  के साथ उठते हुए धुओँ के साथ कुछ पल को अपनी सारी फ़िक्र उड़ा देना चाहता है ✍🏻 इस दो कप चाय के साथ  शायद इतनी बातें दो अजनबी कर लेते हैं जितनी तो अपनों के बीच भी नहीं हो पाती।✍🏻 तो बस जब पूछे कोई अगली बार तुमसे  "चाय पियेंगे..?" ✍🏻 तो हाँ कहकर  बाँट लेना उसके साथ अपनी चीनी सी मीठी यादें और च...

फिर मनाएगा कौन ???????

मैं रूठा ,       तुम भी रूठ गए            फिर मनाएगा कौन ? आज दरार है ,            कल खाई होगी                 फिर भरेगा कौन ? मैं चुप ,      तुम भी चुप            इस चुप्पी को फिर तोडे़गा कौन ? छोटी बात को लगा लोगे दिल से ,            तो रिश्ता फिर निभाएगा कौन ? दुखी मैं भी और  तुम भी बिछड़कर ,                     सोचो हाथ फिर बढ़ाएगा कौन ? न मैं राजी ,        न तुम राजी ,    फिर माफ़ करने का बड़प्पन                                        दिखाएगा कौन ? डूब जाएगा यादों में दिल कभी ,         तो फिर धैर्य बंधायेगा कौन ? एक अहम् मेरे ,        एक तेरे भीतर भी ,  ...

कहाँ पर बोलना है और कहाँ पर बोल जाते हैं...

कहाँ पर बोलना है और कहाँ पर बोल जाते हैं। जहाँ खामोश रहना है वहाँ मुँह खोल जाते हैं।। कटा जब शीश सैनिक का तो हम खामोश रहते हैं। कटा एक सीन पिक्चर का तो सारे बोल जाते हैं।। नयी नस्लों के ये बच्चे जमाने भर की सुनते हैं। मगर माँ बाप कुछ बोले तो बच्चे बोल जाते हैं।। बहुत ऊँची दुकानों में कटाते जेब सब अपनी। मगर मज़दूर माँगेगा तो सिक्के बोल जाते हैं।। अगर मखमल करे गलती तो कोई कुछ नहीँ कहता। फटी चादर की गलती हो तो सारे बोल जाते हैं।। हवाओं की तबाही को सभी चुपचाप सहते हैं। च़रागों से हुई गलती तो सारे बोल जाते हैं।। बनाते फिरते हैं रिश्ते जमाने भर से अक्सर हम मगर घर में जरूरत हो तो रिश्ते भूल जाते हैं।।   कहाँ पर बोलना है और कहाँ पर बोल जाते हैं जहाँ खामोश रहना है वहाँ मुँह खोल जाते हैं।। .

जो कह दिया वह शब्द थे...

जो कह दिया वह शब्द थे ;       जो नहीं कह सके               वो अनुभूति थी ।। और,       जो कहना है मगर ;            कह नहीं सकते,                    वो मर्यादा है ।। जिंदगी का क्या है ?             आ कर नहाया ....                       और,              नहाकर चल दिए ।। बात पर गौर करना- ---- पत्तों सी होती है          कई रिश्तों की उम्र,  आज हरे-------! कल सूखे -------! क्यों न हम,  जड़ों से;  रिश्ते निभाना सीखें ।। रिश्तों को निभाने के लिए,  कभी अंधा , कभी   गूँगा ,     और कभी बहरा ;             होना ही पड़ता है ।। बरसात गिरी  और कानों में इतना कह गई कि---------! गर्मी हमेशा,  किसी की भी नहीं रहती ।। नसीहत ,...

एक आँसू बोल पड़ा....

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एक आँसू बोल पड़ा, किस की खातिर इतना रोते हो.. क्या गम है तुझकों, कि सारी रात जागते रहते हो.. किसी बात की फिक्र हैं तुम्हें, क्यों इतना डरते हो... क्यों तन्हा,क्यों बेचैन, क्यों इतना खामोश रहते हो.. हो कोई गम तो बांट लो मुझसे, अपना दोस्त समझ कर... क्यों इस रंगीन दुनियां में तुम, यूँ सुने सुने से रहते हो... रखते हो सबकों खुश, फिर क्यों ख़ुद दुःखी रहते हो... ऐसी क्या बात लगी है दिल पर, जो ख़ुद तन्हा सहते हो... क्या कहूँ ए आँसू, अब सब कुछ गवारा लगता है... जो सब था कभी अपना, अब सब पराया लगता है... दिखावे की हे ये दुनियां, यहां सब फ़रेब के रिश्ते है... जो रोशन करता है सबकों, उसी से ये लोग जलते है... कर बैठा मैं भी ये गुनाह, सबकों खुशियां बांट दी... मैंने तो अपनी ज़िंदगी, इन्ही की खुशियों में काट दी...

ऐ शहर मुझे तेरी औक़ात पता है....

तेरी बुराइयों को हर अख़बार कहता है... और तू मेरे गांव को गँवार कहता है .... ऐ शहर मुझे तेरी औक़ात पता है.... तू चुल्लू भर पानी को भी वाटर पार्क कहता है.... थक  गया है हर शख़्स काम करते करते .... तू इसे अमीरी का बाज़ार कहता है... गांव  चलो वक्त ही वक्त है सबके पास .... तेरी सारी फ़ुर्सत तेरा इतवार कहता है ..... मौन  होकर फोन पर रिश्ते निभाए जा रहे हैं .... तू इस मशीनी दौर  को परिवार कहता है .... जिनकी सेवा में खपा  देते थे जीवन सारा.... तू उन माँ बाप  को अब भार कहता है ..... वो मिलने आते थे तो कलेजा साथ लाते थे.... तू दस्तूर  निभाने को रिश्तेदार कहता है .... बड़े-बड़े मसले हल करती थी पंचायतें ..... तु अंधी भ्रष्ट दलीलों को दरबार कहता है .... बैठ जाते थे अपने पराये सब बैलगाडी में .... पूरा परिवार  भी न बैठ पाये उसे तू कार कहता है .... अब बच्चे भी बड़ों का अदब भूल बैठे हैं ..... तू इस नये दौर  को संस्कार कहता है .....

तुमने कहा था हम एक ही हैं तो अपने बराबर कर दो ना....

तुमने कहा था हम एक ही हैं तो अपने बराबर कर दो ना.. नैपी जब मैं बदलती हूं तुम दूध की बोतल भर दो ना... बस यूं ही एक हैं एक हैं  करके कहां ज़िंदगी चलती है.. कभी तुम भी सर दबा दो मेरा, ये भी कमी एक खलती है... जब मैं भी ऑफिस जाती हूं, तुम भी घर को संवार दो ना.. तुमने कहा था हम एक ही हैं तो अपने बराबर कर दो ना... मत करो वादे जन्मों के, इस पल ख़ुशी की वजह दो ना.. कभी बाज़ारों से ध्यान हटे, तो मकान को घर भी कर दो ना... आओ पास बैठो, कुछ बातें करें, कभी दिल के ज़ख्म भी भर दो ना... क्यों कहना भी पड़ता है ये, तुम एहसासों को समझो ना... तुमने कहा था हम एक ही हैं तो अपने बराबर कर दो ना... तुम क्रिकेट भी अपनी देखो और मैं सीरियल अपना लगाऊंगी... थोड़ा हाथ बंटा देना, मैं जब किचन में जाऊंगी.... सब मिलकर साथ करने की हममें ये भी तो क्वॉलिटी है... हम साथ खड़े हैं इक-दूजे के, हल ही जेंडल इक्वॉलिटी है... तुम भी नए से हो जाओ अब, और नई सी मुझको उमर दो ना.. तुमने कहा था हम एक ही हैं तो अपने बराबर कर दो ना....

लोग हैं ......

तू अपनी खूबियां ढूंढ, कमियां निकालने के लिए                                     लोग हैं| अगर रखना ही है कदम तो आगे रख, पीछे खींचने के लिए                                      लोग हैं| सपने देखने ही है तो ऊंचे देख, निचा दिखाने के लिए                                      लोग हैं| अपने अंदर जुनून की चिंगारी भड़का, जलने के लिए                                      लोग हैं| अगर बनानी है तो यादें बना, बातें बनाने के लिए                                      लोग हैं| प्यार करना है तो खुद से कर, दुश्मनी करने के लिए      ...

बड़े दिन हो गए...

वो माचिस की सीली डब्बी, वो साँसों में आग.. बरसात में सिगरेट सुलगाये ....बड़े दिन हो गए...। एक्शन का जूता और ऊपर फॉर्मल सूट... बेगानी शादी में दावत उड़ाए ....बड़े दिन हो गए...। ये बारिशें आज...