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हमारा भी एक जमाना था...

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खुद ही स्कूल जाना पड़ता था क्योंकि साइकिल बस आदि से भेजने की रीत नहीं थी, स्कूल भेजने के बाद कुछ अच्छा बुरा होगा ऐसा हमारे मां-बाप कभी सोचते भी नहीं थे... उनको किसी बात का डर भी नहीं होता था, 🤪 पास/नापास यही हमको मालूम था... % से हमारा कभी संबंध ही नहीं था... 😛 ट्यूशन लगाई है ऐसा बताने में भी शर्म आती थी क्योंकि हमको ढपोर शंख समझा जा सकता था... 🤣🤣🤣 किताबों में पीपल के पत्ते, विद्या के पत्ते, मोर पंख रखकर हम होशियार हो सकते हैं ऐसी हमारी धारणाएं थी... ☺️☺️ कपड़े की थैली में...बस्तों में..और बाद में एल्यूमीनियम की पेटियों में...किताब कॉपियां बेहतरीन तरीके से जमा कर रखने में हमें महारत हासिल थी.. .. 😁 हर साल जब नई क्लास का बस्ता जमाते थे उसके पहले किताब कापी के ऊपर रद्दी पेपर की जिल्द चढ़ाते थे और यह काम...एक वार्षिक उत्सव या त्योहार की तरह होता था.....  🤗  साल खत्म होने के बाद किताबें बेचना और अगले साल की पुरानी किताबें खरीदने में हमें किसी प्रकार की शर्म नहीं होती थी..क्योंकि तब हर साल न किताब बदलती थी और न ही पाठ्यक्रम... 🤪 हमारे माताजी पिताजी को हमारी पढ़ाई का बोझ है....

थेथर होती हैं औरतें ..

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  🙏 सर्दियों में शादियों में स्त्रियों के स्वेटर न पहनने पर खूब बात होती है ..चुटकुले बनते हैं ..वजह तो पता होगी..न पता हो तो मैं बता देती हूँ .. थेथर होती हैं औरतें .. कभी सर्दी की ठण्ड सुबह जब आप रजाई में दुबके होते हो..तब नहा कर चौके में जाकर आपके लिए नाश्ता बनाती हैं.. स्त्रियाँ किस मिट्टी की बनी होती हैं उन्हें ठण्ड क्यों नहीं लगती..उस वक्त आप उन्हें ममतामई ,महान, देवी और जाने क्या कह कर बेवकूफ बना ले जाते हैं..तब चुटकुले आपकी हलक में फंस जाते हैं.. मई जून की गर्मी में जब चौका तप रहा होता है आप एयर कंडिशनर, कूलर पंखा( जो भी आपकी हैसियत में हो) में बैठे होते है आपके लिए गरमागरम फुल्के उतारे जा रहे होते हैं । कभी उनके साथ उस गर्मी में जाकर काम करके देखिये शहरी औरतें तो सुविधाजनक कपड़ों में होती हैं ग्रामीण स्त्रियाँ सिंथेटिक साड़ियों में सिर ढंके आधा जीवन चौके में बिता देती हैं । उनकी पीठ पेट गर्दन पर घमौरियों की परतें चढ़ती जाती है । घर का वह हिस्सा जो सबसे गर्म होता है वहां ए सी पंखा कूलर क्यों नहीं लगता सोचियेगा कभी .. अधिकाँश पुराने घरों में रसोई में खिड़की तक नहीं होती थी..और ...

औरत क्या है ?

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  जब कोई औरत बच्चे की पैदाइश के वक्त दर्द से चीख रही होती है, तड़प रही होती है तो मेरा दिल चाहता है कि मै उस वक्त उसके पति को ला कर इधर खडा करू ताकि उसे पता चले की उसकी बीवी उसके वंश को बढ़ाने की खातिर कैसे तड़प रही है ताकि उसे बाद मे ये ना कह सके कि " तुमने क्या किया है मेरे लिए..?? तुमने औलाद पैदा कर के कोई अनोखा काम नही किया! कभी उसे घर से निकाल देने और तलाक़ की धमकी ना दे, एक पल मे ना कह दे उसके माँ बाप को के ले जाओ अपनी बेटी को! काश, काश के एक पल मे औरत को एक कौडी का कर देने वाले मर्द भी उस दर्द का अंदाजा कर सके जो बीस हड्डियो के एक साथ टूटने के बराबर होती है! औरत..... औरत क्या है ? हॉट है, चोट है, या सड़क पर गिरा नोट है? अकेली दिखती है तो,.ललचाती है,.बहलाती है, बड़े-बड़े योगियों को भरमाती है अपनी कोख से जनती है, पीर पैगम्बर फिर भी पाप का द्वार कहलाती है चुप रहना ही स्वीकार्य है, बस बोले तो मार दी जाती है। प्रेम और विश्वास है गुण उसका उन से ही ठग ली जाती है। जिस को पाला निज वत्सल से जिस छाती से जीवन सींचा उस छाती के कारण ही वो उन की नजरों में आती है। मेरा तन मेरा है, कह दे तो मर...

वो कैसी औरतें थीं...

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  वो कैसी औरतें थीं... जो गीली लकड़ियों को फूंक कर चूल्हा जलाती थीं जो सिल पर सुर्ख़ मिर्चें पीस कर सालन पकाती थीं सुबह से शाम तक मसरूफ़, लेकिन मुस्कुराती थीं भरी दोपहर में सर अपना ढक कर मिलने आती थीं जो दरवाज़े पे रुक कर देर तक रस्में निभाती थीं पलंगों पर नफ़ासत से दरी-चादर बिछाती थीं बसद इसरार मेहमानों को सिरहाने बिठाती थीं अगर गर्मी ज़्यादा हो तो रुहआफ्ज़ा पिलाती थीं जो अपनी बेटियों को स्वेटर बुनना सिखाती थीं जो "क़लमे" काढ़ कर लकड़ी के फ्रेमों में सजाती थीं दुआएं फूंक कर बच्चों को बिस्तर पर सुलाती थीं अपनी जा-नमाज़ें मोड़ कर तकिया लगाती थीं कोई साईल जो दस्तक दे, उसे खाना खिलाती थीं पड़ोसन मांग ले कुछ तो बा-ख़ुशी देती-दिलाती थीं जो रिश्तों को बरतने के कई गुर सिखाती थीं मुहल्ले में कोई मर जाए तो आँसू बहाती थीं कोई बीमार पड़ जाए तो उसके पास जाती थीं कोई त्योहार पड़ जाए तो ख़ूब मिलजुल कर मनाती थीं वह क्या दिन थे किसी भी दोस्त के हम घर जो जाते थे तो उसकी माँ उसे जो देतीं वह हमको खिलाती थीं मुहल्ले में किसी के घर अगर शादी की महफ़िल हो तो उसके घर के मेहमानों को अपने घर सुलाती थी...

हॉ मैं पुरुष हूँ...

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  हॉ मैं पुरुष हूँ...!! एक साधारण पुरुष... शिव नहीं... जो कि सती की प्रदीप्त चिता को हथेली पर रखकर सम्पूर्ण विश्व में तान्डव कर सकूँ... शायद शिव जी द्वारा सती के लिए किया गया यह कार्य किसी भी पुरुष का एक स्त्री के लिए सर्व सम्पूर्ण समर्पण था..!!! मै सम्पूर्ण समर्पण नही कर पाऊँगा पर ईश्वर ना करे कि ऐसा हो... फिर भी यदि ऐसा होता है तो उस दिन दो चिताएँ जलेंगी... एक श्मशान घाट पर तो दूसरी इस हृदय में, श्मशान घाट की चिता ठन्डी भी पड जाय पर हृदय की चिता अनवरत जलती रहेगी... हमेशा हमेशा के लिए....!!!! मैं पुरुष हूँ....  लेकिन फिर भी मैं पुरुरवा नही हू... कि उर्वशी के प्रेम में उत्तराखन्ड की भूमि नापता रह जाऊँ... मेरा प्रेम मेरी प्रेमिका के लिए सच्चा होगा... परन्तु वह इतना बलशाली नही होगा कि मेरी जिम्मेदारियो से मुझे विमुख करके सिर्फ अपनी तरफ खींच ले जाय...!!!! मैं पुरुष हूँ....  पर मै महाराजा अज नहीं कि रानी इन्दुमती के मृत्यु के कुछ समय पश्चात ही अपने प्राण त्याग दूँगा... मै जीवित रहूँगा.. पर जब रोज की भागदौड से रोज की व्यस्तता से वापस लौटकर अपने मकान पर पहुचूगा तो वहॉ से मेरे त...

तू एक बार लड़का बन कर तो देख...

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लाड प्यार से ज्यादा जिम्मेदारी का पाठ पढ़ाया जाता है.. कितनी मुश्किल से कमाया जाता है पैसा.. बचपन से बस यही सिखाया जाता है..।। तू लड़का है, तू किसी हाल मे रो नहीं सकता है.. खिलौना टूटे या दिल टूटे.. तू पलके भिगो नहीं सकता है..।। किसी के दिल का नूर है तू.. किसी की मांग का सिंदूर है तू.. कौन समझेगा और किसे समझाएगा कि,  कितना थकान से चूर है तू..।। तू तो मर्द है, रोकर दिखा नहीं सकता.. कितना भी टूटा हो दिल तेरा, तू आंसू बहा नही सकता..।। तू दिन-रात, सुबह-शाम ख्वाहिशों की भट्ठी मे जलकर तो देख.. तू एक बार लड़का बनकर तो देख..।। क्या तू देख पाएगा इस उम्र मे मां बाप को काम करते हुए, या फिर देख पाएगा बीवी बच्चों को अभाव मे पलते हुए..।। तुझे कृष्ण बनकर प्रेम का राग सुनाना पड़ेगा.. मन मे बसी हो राधा लेकिन रूक्मणी से ब्याह रचाना पड़ेगा..।। तू अपनी इच्छाओं पर आदर्शों का चोला पहन कर तो देख.. तू एक बार लड़का बनकर तो देख..।। 🌷🙏

आपके जीवन का रंग ......

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  एक सिद्ध गुरु जी ने 30 वर्षीय युवक को भरी सभा में खडा कर पूछा कि आप मुम्बई मेँ जुहू चौपाटी पर चल रहे हैं और सामने से एक सुन्दर लडकी आ रही है तो आप क्या करोगे ? युवक ने कहा - उस पर नजर जायेगी, उसे देखने लगेंगे। गुरु जी ने पूछा - वह लडकी आगे बढ गयी तो क्या पीछे मुडकर भी देखोगे ? लडके ने कहा - हाँ, अगर धर्मपत्नी साथ नहीं है तो। (सभा में सभी हँस पडे) गुरु जी ने फिर पूछा - जरा यह बताओ वह सुन्दर चेहरा आपको कब तक याद रहेगा ? युवक ने कहा 5 - 10 मिनट तक, जब तक कोई दूसरा सुन्दर चेहरा सामने न आ जाए। गुरु जी ने उस युवक से कहा - अब जरा सोचिए, आप जयपुर से मुम्बई जा रहे हैं और मैंने आपको एक पुस्तकों का पैकेट देते हुए कहा कि मुम्बई में अमुक महानुभाव के यहाँ यह पैकेट पहुँचा देना। आप पैकेट देने मुम्बई में उनके घर गए। उनका घर देखा तो आपको पता चला कि ये तो बडे अरबपति हैं। घर के बाहर 10 गाडियाँ और 5 चौकीदार खडे हैं। आपने पैकेट की सूचना अन्दर भिजवाई तो वे महानुभाव खुद बाहर आए। आप से पैकेट लिया। आप जाने लगे तो आपको आग्रह करके घर में ले गए। पास में बैठकर गरम खाना खिलाया। जाते समय आप से पूछा - किसमें आए ...