हॉ मैं पुरुष हूँ...

 


हॉ मैं पुरुष हूँ...!!

एक साधारण पुरुष... शिव नहीं... जो कि सती की प्रदीप्त चिता को हथेली पर रखकर सम्पूर्ण विश्व में तान्डव कर सकूँ... शायद शिव जी द्वारा सती के लिए किया गया यह कार्य किसी भी पुरुष का एक स्त्री के लिए सर्व सम्पूर्ण समर्पण था..!!! मै सम्पूर्ण समर्पण नही कर पाऊँगा पर ईश्वर ना करे कि ऐसा हो... फिर भी यदि ऐसा होता है तो उस दिन दो चिताएँ जलेंगी... एक श्मशान घाट पर तो दूसरी इस हृदय में, श्मशान घाट की चिता ठन्डी भी पड जाय पर हृदय की चिता अनवरत जलती रहेगी... हमेशा हमेशा के लिए....!!!!

मैं पुरुष हूँ....

 लेकिन फिर भी मैं पुरुरवा नही हू... कि उर्वशी के प्रेम में उत्तराखन्ड की भूमि नापता रह जाऊँ... मेरा प्रेम मेरी प्रेमिका के लिए सच्चा होगा... परन्तु वह इतना बलशाली नही होगा कि मेरी जिम्मेदारियो से मुझे विमुख करके सिर्फ अपनी तरफ खींच ले जाय...!!!!

मैं पुरुष हूँ....

 पर मै महाराजा अज नहीं कि रानी इन्दुमती के मृत्यु के कुछ समय पश्चात ही अपने प्राण त्याग दूँगा... मै जीवित रहूँगा.. पर जब रोज की भागदौड से रोज की व्यस्तता से वापस लौटकर अपने मकान पर पहुचूगा तो वहॉ से मेरे तिल तिल घटने की प्रक्रिया शुरु होगी... यकीन करिए कोई और जान भी नही पाएगा क्योकि मै पुरुष हूँ..!!!

मैं पुरुष हूँ... 

पर मेघदूतम का यक्ष नहीं...
मैं पुरुष हूँ... पर भृगुदूतम् का राम नहीं... मेरा सन्देश बादल और भ्रमर नहीं ले जा सकते... शायद मेरा प्रेम उस स्तर का ना हो... परन्तु मैं मोबाइल के कीपैड पर ऊँगलिया चलाकर अपना समाचार वहॉ तक पहुँचा ही दूँगा....!!! शायद अपना ना कहकर केवल उसका ही सुनूँ....!!!

मैं पुरुष हूँ...

एक बार फिर से मर्यादा पुरुषोत्तम राम नहीं.... मै उसके ना होने पर विक्षिप्त नही हो पाऊँगा, मैं पेड पौधो, पशु पक्षियो से उसका पता नही पूछ पाऊँगा, मै शायद सागर पर सेतुबन्ध भी नही कर पाऊँगा... उसके वियोग मे शायद जल समाधि भी नही ले पाऊँगा... पर जो एक बात तय है वह यह कि किसी के कहने मात्र से ही मै उसका परित्याग नही करुगा... वह कैसी भी विवशता हो कैसी भी मजबूरी हो मै उसे छोड नही सकता....!!!

मैं पुरुष हूँ...

मै यह दावा भी नही करता कि मैने कन्याओ पर कटाक्ष नही किए... मैने किए हैं... पर जो एक बात दावे से कहता हूँ... छिछोरापन नही किया... स्त्री का हर रुप देखा... माँ, बहन, दादी, नानी, मामी, बुआ, मौसी, दीदी, चाची, मित्र, प्रेयसी, सहयात्री, भाभी, भावज, पडोसी हर रुप बस नही देखा तो पत्नी का रुप.... पर इतना विश्वास खुद पर है कि जब इतने सारे रुप मे किसी स्त्री को मेरे व्यक्तित्व से कोई परेशानी नही हुई... (यह इसलिए कह रहा क्योकि मुझे कभी नही हुई) तो पत्नी को भी नही ही होगी....!!!!

इतना स्पष्टीकरण सिर्फ इसलिए क्योकि मै पुरुष हूँ... शायद पुरुषवादी भी... पर स्त्रीत्व का चीरहरण करके मुझे अपनी वादिता को शिखर तक पहुँचाना भी नहीं...!!!

हममे राम ढूढने से पहले स्वयम् मे सीता की प्रतिकृति लाइये, मुझमे शिव ढूढने से पहले सती की छवि अपने अन्तस से बाहर निकालिएगा, मुझमे कृष्ण ढूढिए पर राधा बनकर.... वरना छैला बिहारी ही नजर आएगा...

और हॉ मै पुरुष हूँ... अत: अहम टकराता भी है...!!!!

मेरी खोज  तो तुम्हे पाकर सम्पूर्ण हो चुकी है

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