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सभी गृहणीयो को समर्पित...

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  रसायनशास्त्र से शायद ना पड़ा हो पाला  पर सारा रसोईघर प्रयोगशाला दूध में साइटरीक एसिड डालकर पनीर बनाना या सोडियम बाई कार्बोनेट से केक फूलाना चम्मच से सोडियम क्लोराइड का सही अनुपात तोलती रोज कितने ही प्रयोग कर डालती हैं पर खुद को कोई  वैज्ञानिक नही   बस गृहिणी ही मानती हैं रसोई गैस की बढ़े कीमते या सब्जी के बढ़े भाव  पैट्रोल डीजल महँगा हो या तेल मे आए उछाल  घर के बिगड़े हुए बजट को झट से सम्हालती है अर्थशास्त्री होकर भी  खुद को बस गृहिणी ही मानती हैं मसालों के नाम पर भर रखा आयूर्वेद का खजाना गमलो मे उगा रखे हैं  तुलसी गिलोय करीपत्ता छोटी मोटी बीमारियों को काढ़े से भगाना जानती है पर खुद को बस गृहिणी ही मानती हैं   सुंदर रंगोली और मेहँदी में नजर आती इनकी चित्रकारी सुव्यवस्थित घर में झलकती है इनकी कलाकारी  ढोलक की थाप पर गीत गाती नाचती है  कितनी ही कलाए जानती है पर खुद को बस गृहिणी ही मानती हैं समाजशास्त्र ना पढ़ा हो शायद  पर इतना पता है कि  परिवार समाज की इकाई है परिवार को उन्नत कर  समाज की उन्नति में पूरा योगदान डालती ह...

ऑनलाइन इश्क़ क्या है....???

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  बार - बार पूछते हो ना कि ऑनलाइन इश्क़ क्या है , तो सुनो:- गुफ्तगू करने की.. अनगिनत ख्वाहिशों के बीच..  "ऑनलाइन" होकर भी चीखती खामोशियाँ.. इश्क़ है..😍 मशरुफ़ियत.. कितनी भी भारी पड़े कैफ़ियत पूछने पर.. बस इक बार.. "Last seen" देखने वाली बेचैनियाँ.. इश्क़ है..😍 व्हाट्सअप पर एक ही msg को बार- बार, हज़ार बार पढ़ना इश्क़ है, उनके msg का इंतज़ार करना इश्क़ है, msg के डबल लाइन को ब्लू लाइन में बदलते देखना इश्क़ है....😍 उसकी "typing..." पर, खुशी से काँपती  उँगलियाँ.. इश्क़ है..😍 उसकी "New profile pic" को.. मिनटों तक.. एकटक झाँकती पलकों की पंखुड़ियाँ.. इश्क़ है..😍 जरा सी आहट पे.. फोन पकड़ कर बैठ जाना.. वो "notification" की टनटनाती घंटियाँ..फिर फ़ोन को म्यूट करना इश्क़ है..😍 कैसे हो? पूछने पर.. "i am fine" बताना लिख कर मिटाना.. मिटा कर छिपाना, वो "draft" में बेबस पड़ी अनकही अर्जियाँ .. इश्क़ है..😍 उसका नाम सुन कर धड़कनों का बढ़ जाना.. और.. उसका नाम सुना कर सहेलियों की मन-मर्जियाँ.. इश्क़ है..😍 देर तक चलने वाली "convo...

खैर सबकुछ ठीक ही है...

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  मन खाली सा हो गया है...कुछ भी ठहरता नहीं बहुत देर तक... गुस्सा जितनी जल्दी आता है उतना ही जल्दी शांत भी हो जाता है... रोना कुछ देर का ही है फिर "सब ठीक है" ...कहकर चीजें हटा दी जाती है, दिल और दिमाग से... कहने को बहुत से लोग हैं साथ पर अकेलापन ज्यादा सुखद लगता है अब...  नहीं पता समझदारी घर कर चुकी है या बेवकूफी कर रहा हूं आजकल... फॉर्मल चीजें ,जो करनी भी जरूरी है वो भी नहीं करता..  किसी जान पहचान वाले को देखकर छुप जाने का मन करता है इसलिये नहीं कि वो बात करेगा, चंद सवालात करेगा इसलिये कि अब बातें ही शुरू नहीं करना चाहता शुरू से मैं..   लगता है जो छूट गया सो छूट गया...जो है सो है... नहीं है तो भी कोई गम नहीं और है भी तो क्या पता कल न हो... कुछ सपने जो कभी देखे थे अब जिम्मेदारी से महसूस होते हैं और जिम्मेदारियां एक वक्त के बाद बोझिल होने लगती है... ना खुद से ना दुनिया से कोई शिकायत रही ना ही उन लोगों से कोई शिकवा है जिन्होंने इन आँखो को आँसू दिये... माफ किया ये तो नहीं कह सकता बस अब फर्क नहीं पड़ता कि किसने क्या दिया  खैर सबकुछ ठीक ही है...

हमें यह नहीं पता कि क्या ढ़कना है और क्या खुला रखना है ...??

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  हमें यह नहीं पता कि क्या ढ़कना है और क्या खुला रखना है ...?? हम भारतवासियों को कवर चढ़ाने का बहुत शौक है...।। बाज़ार से बहुत सुंदर सोफा खरीदेंगे लेकिन फिर उसे सफेद जाली के कवर से ढक देंगे |🤔 बढ़िया रंग का सुंदर सूटकेस खरीदेंगे, फिर उस पर मिलिट्री रंग का कपड़ा चढ़ा देंगे |🤔 मखमल की रजाई पर फूल वाले फर्द का कवर!🤔 फ्रिज पर कवर!🤔 माइक्रोवेव पर कवर!🤔 वाशिंग मशीन पर कवर!🤔 मिक्सी पर कवर!🤔 थर्मस वाली बोतल पर कवर!🤔 TV पर कवर!🤔 कार पर कवर!🤔 कार की कवर्ड सीट पर एक और कवर!🤔 स्टेयरिंग पर कवर!🤔 गियर पर कवर!🤔 फुट मैट पर एक ओर कवर!🤔 सुंदर शीशे वाली डाइनिंग टेबल पर प्लास्टिक का कवर!🤔 स्टूल कवर!🤔 चेयर कवर!🤔 मोबाइल कवर!🤔 बेडशीट के ऊपर बेड कवर!🤔 गैस के सिलिंडर पर कवर!🤔 RO पर कवर!🤔 किताबों पर कवर!🤔 . काली कमाई पर कवर!🤔 गलत हरकतों पर कवर!🤔 बुरी नियत पर कवर!🤔 लेकिन.......... . कचरे के डिब्बे पर ढक्कन नदारद!!😁 खुली नालियों के कवर नदारद!!😁 कमोड पर ढक्कन नदारद!!😁 मैनहोल के ढक्कन नदारद!!😁 सर से हेलमेट नदारद!!😁 खुले खाने पर से कवर नदारद!!😁 आधुनिकता में तन से कपडे नदारद!!😁 इंसानों ...

कर्मो का लेख...

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बेटा बन कर,बेटी बनकर, दामाद बनकर,और बहु  बनकर कौन आता है ?  जिसका तुम्हारे साथ कर्मों का लेना देना होता है। लेना देना नहीं होगा तो नहीं आयेगा। एक फौजी था। उसके मां बाप नहीं थे। शादी नहीं की, ,भाई नहीं, बहन नहीं, अकेला ही कमा कमा के फौज में जमा करता जा रहा था।  थोड़े दिन में एक सेठ जी जो फौज में माल सप्लाई करते थे उनसे उनका परिचय हो गया और दोस्ती हो गई । सेठ जी ने कहा जो तुम्हारे पास पैसा है वो उतने के उतने ही पड़ा हैं ।तुम मुझे दे दो मैं कारोबार में लगा दूं तो पैसे से पैसा बढ़ जायेगा इसलिए तुम मुझे दे दो। फौजी ने सेठ जी को पैसा दे दिया। सेठ जी ने कारोबार में लगा दिया। कारोबार उनका चमक गया, खूब कमाई होने लगी कारोबार बढ़ गया। थोड़े ही दिन में लड़ाई छिड़ गई। लड़ाई में फौजी घोड़ी पर चढ़कर लड़ने गया। घोड़ी इतनी बदतमीज थी कि जितनी ज़ोर- ज़ोर से लगाम खींचे उतनी ही तेज़ भागे। खीेंचते खींचते उसके गल्फर तक कट गये लेकिन वो दौड़कर दुश्मनों के गोल घेरे में जाकर खड़ी हो गई। दुश्मनों के साथ संघर्ष में जवान शहीद हो गया घोड़ी भी मर गई। अब सेठ जी को मालूम हुआ कि फौजी नही रहा, तो सेठ जी बहुत खुश हुए कि उस...

बुजुर्गों का सम्मान...

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,छोटे ने कहा," भैया, दादी कई बार कह चुकी हैं कभी मुझे भी अपने साथ होटल ले जाया करो."* गौरव बोला, " ले तो जायें पर चार लोगों के खाने पर कितना खर्च होगा.  याद है, पिछली बार जब हम तीनों ने डिनर लिया था, तब सोलह सौ का बिल आया था.  हमारे पास अब इतने पैसे कहाँ बचे हैं. " पिंकी ने बताया," मेरे पास पाकेटमनी के कुछ पैसे बचे हुए हैं."  तीनों ने मिलकर तय किया कि इस बार दादी को भी लेकर चलेंगे,  इस बार मँहगी पनीर की सब्जी की जगह मिक्सवैज मँगवायेंगे और आइसक्रीम भी नहीं खायेंगे. छोटू, गौरव और पिंकी तीनों दादी के कमरे में गये और बोले, "दादी इस' संडे को लंच बाहर लेंगे, चलोगी हमारे साथ." दादी ने खुश होकर कहा," तुम ले चलोगे अपने साथ."  "हाँ दादी " संडे को दादी सुबह से ही बहुत खुश थी.  आज उन्होंने अपना सबसे बढिया वाला सूट पहना, हल्का सा मेकअप किया, बालों को एक नये ढंग से बाँधा. आँखों पर सुनहरे फ्रेमवाला नया चश्मा लगाया. यह चश्मा उनका मँझला बेटा बनवाकर दे गया था जब वह पिछली बार लंदन से आया था.  किन्तु वह उसे पहनती नहीं थी, कहती थी, इतना सुन्दर...

बचपन की दुनिया

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  एक ऐसी पोस्ट, जिसकी पहली लाइन पढ़ते ही आप खुद इसके मुख्य पात्र हो जाएंगे।❤️ ** बचपन में स्कूल के दिनों में क्लास के दौरान टीचर द्वारा पेन माँगते ही हम बच्चों के बीच राकेट गति से गिरते पड़ते सबसे पहले उनकी टेबल तक पहुँच कर पेन देने की अघोषित प्रतियोगिता होती थी। जब कभी मैम किसी बच्चे को क्लास में कापी वितरण में अपनी मदद करने पास बुला ले, तो मैडम की सहायता करने वाला बच्चा अकड़ के साथ "अजीमो शाह शहंशाह" बना क्लास में घूम-घूम कर कापियाँ बाँटता और बाकी के बच्चें मुँह उतारे गरीब प्रजा की तरह अपनी चेयर से न हिलने की बाध्यता लिए बैठे रहते। 🙄 उस मासूम सी उम्र में उपलब्धियों के मायने कितने अलग होते थे टीचर ने क्लास में सभी बच्चो के बीच गर हमें हमारे नाम से पुकार लिया .....टीचर ने अपना रजिस्टर स्टाफ रूम में रखकर आने  का बोल दिया तो समझो कैबिनेट मिनिस्टरी में चयन का गर्व होता था। 😁 आज भी याद है जब बहुत छोटे थे, तब बाज़ार या किसी समारोह में हमारी टीचर दिख जाए तो भीड़ की आड़ ले छिप जाते थे। जाने क्यों, किसी भी सार्वजनिक जगह पर टीचर को देख हम छिप जाते थे ?       ...