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ये गृहणियाँ भी थोड़ी पागल होती हैं ...

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  सलीके से आकार दे कर रोटियों को गोल बनाती हैं अौर अपने शरीर को ही आकार देना भूल जाती हैं ये गृहणियाँ भी थोड़ी पागल सी होती हैं।। ढेरों वक्त़ लगा कर घर का हर कोना कोना चमकाती हैं उलझी बिखरी ज़ुल्फ़ों को ज़रा सा वक्त़ नही दे पाती हैं ये गृहणियाँ भी थोड़ी पागल सी होती हैं।। किसी के बीमार होते ही सारा घर सिर पर उठाती हैं कर अनदेखा अपने दर्द सब तकलीफ़ें टाल जाती हैं ये गृहणियाँ भी थोड़ी पागल सी होती हैं ।। खून पसीना एक कर सबके सपनों को सजाती हैं अपनी अधूरी ख्वाहिशें सभी दिल में दफ़न कर जाती हैं ये गृहणियाँ भी थोड़ी पागल सी होती हैं।। सबकी बलाएँ लेती हैं सबकी नज़र उतारती हैं ज़रा सी ऊँच नीच हो तो नज़रों से उतर ये जाती हैं ये गृहणियाँ भी थोड़ी पागल सी होती हैं।। एक बंधन में बँध कर कई रिश्तें साथ ले चलती हैं कितनी भी आए मुश्किलें प्यार से सबको रखती हैं ये गृहणियाँ भी थोड़ी पागल सी होती हैं।। मायके से सासरे तक हर जिम्मेदारी निभाती है कल की भोली गुड़िया रानी आज समझदार हो जाती हैं ये गृहणियाँ भी..... वक्त़ के साथ ढल जाती हैं।।

साबुन के टुकड़े ...

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रोज़ जब नहाने जाता हूँ गुसलखाने में पाता हूँ साबुन ख़त्म होने को है, मगर वो जो दूरी है गुसलखाने से स्टोर तक की मेरी मजबूरी है, मैं तय नहीं कर पाता हूँ क्योंकि वक़्त कम है और काम ज़्यादा है, साबुन लाने गया तो दो मिनट और चले जायेंगे, वो दो मिनट जो मैंने रखे हैं नाश्ते के लिए वो दो मिनट जो मैंने रखे हैं छोटे रास्ते के लिए वो दो मिनट जो रखे हैं मंदिर पर माथा टेकने के लिए वो दो मिनट जो रखे हैं खुद को शीशे में देखने के लिए वो दो मिनट जो रखे हैं बच्चों से कुछ बोलने के लिए वो दो मिनट जो रखे हैं माँ की दवाई खोलने के लिए वो दो मिनट जो रखे हैं मैच की हाइलाइट्स के लिए वो दो मिनट जो रखे हैं बहन के संग फाइट्स के लिए वो दो मिनट जो रखे हैं पिताजी को यूट्यूब दिखाने के लिए वो दो मिनट जो रखे हैं रूठी हुई बीवी को मनाने के लिए, वो दो मिनट अगर साबुन लाने में चले गए तो वो दो मिनट भी ऑफिस खा जाएगा और उस दो मिनट के बाद जो तीसरा मिनट आएगा वहाँ से उधेड़ेगी ज़िन्दगी मुझको धागा धागा और जब मैं पहुँचूँगा घर वापस भागा भागा, माँ बाप सो चुके होंगे बच्चे सपनों में खो चुके होंगे बीवी भी मेरे जितना उधड़ चुकी होगी ज़िन्दगी पूरे दि...

मेरे अजनबी हमसफ़र....

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वो ट्रेन के रिजर्वेशन के डब्बे में बाथरूम के तरफ वाली सीट पर बैठी थी... उसके चेहरे से पता चल रहा था कि थोड़ी सी घबराहट है उसके दिल में कि कहीं टीटी ने आकर पकड़ लिया तो..कुछ देर तक तो पीछे पलट-पलट कर टीटी के आने का इंतज़ार करती रही। शायद सोच रही थी कि थोड़े बहुत पैसे देकर कुछ निपटारा कर लेगी। देखकर यही लग रहा था कि जनरल डब्बे में चढ़ नहीं पाई इसलिए इसमें आकर बैठ गयी, शायद ज्यादा लम्बा सफ़र भी नहीं करना होगा। सामान के नाम पर उसकी गोद में रखा एक छोटा सा बेग दिख रहा था। मैं बहुत देर तक कोशिश करता रहा पीछे से उसे देखने की कि शायद चेहरा सही से दिख पाए लेकिन हर बार असफल ही रहा...फिर थोड़ी देर बाद वो भी खिड़की पर हाथ टिकाकर सो गयी। और मैं भी वापस से अपनी किताब पढ़ने में लग गया...लगभग 1 घंटे के बाद टीटी आया और उसे हिलाकर उठाया। “कहाँ जाना है बेटा” “अंकल दिल्ली तक जाना है”“टिकट है ?” “नहीं अंकल …. जनरल का है ….लेकिन वहां चढ़ नहीं पाई इसलिए इसमें बैठ गयी”“अच्छा 300 रुपये का पेनाल्टी बनेगा” “ओह …अंकल मेरे पास तो लेकिन 100 रुपये ही हैं”“ये तो गलत बात है बेटा …..पेनाल्टी तो भरनी पड़ेगी” “सॉरी अंकल …...

एक तनख्वाह से कितनी बार टेक्स दूं और क्यों...जवाब है???

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  एक तनख्वाह से कितनी बार टेक्स दूं और क्यों...जवाब है??? मैनें तीस दिन काम किया, तनख्वाह ली -  इनकम टैक्स दिया मोबाइल खरीदा - टैक्स दिया--' रिचार्ज किया - टैक्स दिया डेटा लिया - टैक्स दिया बिजली ली - टैक्स दिया घर लिया - टैक्स दिया TV फ्रीज़ आदि लिये - टैक्स दिया कार ली - टैक्स दिया पेट्रोल लिया - टैक्स दिया सर्विस करवाई - टैक्स दिया रोड पर चला - टैक्स दिया टोल पर फिर - टैक्स दिया लाइसेंस बनवाया - टैक्स दिया गलती की तो - टैक्स दिया रेस्तरां में खाया - टैक्स दिया पार्किंग का - टैक्स दिया पानी लिया - टैक्स दिया राशन खरीदा - टैक्स दिया कपड़े खरीदे - टैक्स दिया जूते खरीदे - टैक्स दिया किताबें लीं - टैक्स दिया टॉयलेट गया - टैक्स दिया दवाई ली तो - टैक्स दिया गैस ली - टैक्स दिया सैकड़ों और चीजें ली और - टैक्स दिया, कहीं फ़ीस दी, कहीं बिल, कहीं ब्याज दिया, कहीं जुर्माने के नाम पर तो कहीं रिश्वत के नाम पर पैसे  देने पड़े, ये सब ड्रामे के बाद गलती से सेविंग में बचा तो फिर टैक्स दिया---- सारी उम्र काम करने के बाद कोई सोशल सिक्युरिटी नहीं,कोई मेडिकल सुविधा नहीं, पब्लिक ट्रांस्पोर्ट नहीं,...

भगवा धोती तिलक कौन रोक रहा है सर ?

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  एक दर्द पैदा करती पोस्ट- हमें बदलना होगा पीढ़ियों के लिये तुरंत 😔🤔   एक मुस्लिम महिला की कलम से...... हिजाब के सम्बन्ध में ... भगवा धोती तिलक कौन रोक रहा है सर? आप ही लोग तो पीछा छुड़ाएं बैठे है इन चीजों से ! मुस्लिमों ने अपनी जड़ें न कल छोड़ी थीं न आज छोड़ने को राजी हैं! आप लोगों को तो खुद कुछ साल पहले तिलक, भगवा, शिखा, से शर्म आती थी, आप ही लोगों ने आधुनिकता के नाम पर सब कुछ त्याग दिया! आप नहीं त्यागते तो स्कूल में धोती कुर्ता पहनना नॉर्मल माना जाता!  बीएचयू में डिग्री लेते वक्त बच्चों का भारतीय पारंपरिक पोशाक पहनना खबर बनता है, जबकि यह तो नॉर्मल होना चाहिए था न ? खबर तो यह होती न कि हिंदू छात्रों ने गाउन पहन कर डिग्री ली! आपने खुद अपनी संस्कृति, अपने रीति रिवाज अपनी जड़ों को पिछड़ेपन के नाम पर त्यागा है! आज इतने साल बाद आप लोगों की नींद खुली है तो आप लोगो को उनकी जड़ों की तरफ लौटने के लिए कहते फिरते हैं! अपनी नाकामी, अपनी लापरवाही का गुस्सा हमारी जड़ों को काट कर क्यों निकालना चाहते हैं आप? आप के बच्चे कॉन्वेंट से पढ़ने के बाद पोएम सुनाते थे तो आपका सर ऊंचा होता था ...

मैं एक टेडी बियर हूँ ...

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  टेडी बियर की उत्तपत्ति कब ? कहाँ ? कैसे ? और किसके द्वारा ? हुई थी इस बारे में मैं उतना ही जानता हूँ जितना आदमी खुद के बारे में जानता है। विज्ञान की पुस्तकों में जो और जितना लिखा गया है वह सिर्फ ये सिद्ध करता है कि हमारा ज्ञान अभी यहाँ तक पहुँचा है – हो सकता है भविष्य में जब और जानकारी मिले – और तथ्य सिद्ध हुए तो पुरानी परिभाषाएं – मान्यतायें बदल जाये। ठीक वैसे ही जैसे – पहले धरती चपटी बतायी गयी थी अब गोल हो गयी है– हो सकता है भविष्य में कुछ और ही सिद्ध हो जाये – कुछ और ही कहा जाने लगे। खैर, मैं कहाँ खुद का इतिहास बताते-बताते आपका इतिहास बाँचने लगा। कुल मिला कर मैं एक सुंदर-सा मुलायम-सा प्यारा-सा खिलौना हूँ। जिसकी शक्ल जंगली भालू से मिलती है। सिर्फ शक्ल ही मिलती है रंग भी मिलने लगे तो पोलर बियर की तो कोई इज्जत भी हो काले भालू को कौन खरीदेगा ? मादरी जुबान में मुझें मुलायम खिलौना भालू ही कहेंगे पर मादरी जुबान में कहने पर मुझमें आकर्षण का अभाव हो जायेगा शायद इसी लिए मेरा टेडी बियर नाम मशहूर किया गया है। टेडी बियर कहते ही जेहन में मेरा ध्यान आता है। आज दिनांक 10 फरवरी मनुष्यों में टे...

जिंदगी की धड़कन ...

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  किसी बात पर पत्नी से चिकचिक हो गई! वह बड़बड़ाते घर से बाहर निकला! सोचा कभी इस लड़ाकू औरत से बात नहीं करूँगा, पता नहीं समझती क्या है खुद को? जब देखो झगड़ा, सुकून से रहने नहीं देती! नजदीक के चाय के स्टॉल पर पहुँच कर चाय ऑर्डर की और सामने रखे स्टूल पर बैठ गया! तभी पीछे से एक आवाज सुनाई दी - "इतनी सर्दी में बाहर चाय पी रहे हो?" उसने गर्दन घुमा कर देखा तो पीछे के स्टूल पर बैठे एक बुजुर्ग उससे मुख़ातिब थे! ...आप भी तो इतनी सर्दी और इस उम्र में बाहर हैं बाबा..." वह बोला! बुजुर्ग ने मुस्कुरा कर कहा - "मैं निपट अकेला, न कोई गृहस्थी, न साथी, तुम तो शादीशुदा लगते हो बेटा..." "पत्नी घर में जीने नहीं देती बाबा,हर समय चिकचिक.. बाहर न भटकूँ तो क्या करूँ जिंदगी जहन्नुम बना कर रख दी है ।गर्म चाय के घूँट अंदर जाते ही दिल की कड़वाहट निकल पड़ी बुजुर्ग-: पत्नी जीने नहीं देती? बरखुरदार ज़िन्दगी ही पत्नी से होती है 8 बरस हो गए हमारी पत्नी को गए हुए, जब ज़िंदा थी, कभी कद्र नहीं की, आज कम्बख़्त चली गयी तो भुलाई नहीं जाती, घर काटने को होता है, बच्चे अपने अपने काम में मस्त,आलीशान घर, धन द...