Posts

मैंने दहेज़ नहीं माँगा ...

Image
  साहब मैं थाने नहीं आउंगा, अपने इस घर से कहीं नहीं जाउंगा, माना पत्नी से थोड़ा मन-मुटाव था, सोच में अन्तर और विचारों में खिंचाव था, पर यकीन मानिए साहब, “मैंने दहेज़ नहीं माँगा” मानता हूँ कानून आज पत्नी के पास है, महिलाओं का समाज में हो रहा विकास है। चाहत मेरी भी बस ये थी कि माँ बाप का सम्मान हो, उन्हें भी समझे माता पिता, न कभी उनका अपमान हो। पर अब क्या फायदा, जब टूट ही गया हर रिश्ते का धागा, यकीन मानिए साहब, “मैंने दहेज़ नहीं माँगा” परिवार के साथ रहना इसे पसंन्द नहीं है, कहती यहाँ कोई रस, कोई आनन्द नही है, मुझे ले चलो इस घर से दूर, किसी किराए के आशियाने में, कुछ नहीं रखा माँ बाप पर प्यार बरसाने में, हाँ छोड़ दो, छोड़ दो इस माँ बाप के प्यार को, नहीं माने तो याद रखोगे मेरी मार को, फिर शुरू हुआ वाद विवाद माँ बाप से अलग होने का, शायद समय आ गया था, चैन और सुकून खोने का, एक दिन साफ़ मैंने पत्नी को मना कर दिया, न रहूँगा माँ बाप के बिना ये उसके दिमाग में भर दिया। बस मुझसे लड़कर मोहतरमा मायके जा पहुंची, 2 दिन बाद ही पत्नी के घर से मुझे धमकी आ पहुंची, माँ बाप से हो जा अलग, नहीं सबक सीखा देंगे , क...

मास्टरपीस ...

Image
मेरी वो काली स्लेट याद है तुम्हें? वही जिसके कोनों पर मेटल लगी थी, जिन्हें जंग खाये जा रही थी । गोद में रखकर, छुपाकर उसपर कुछ लिख रही थी तुम शायद । बिल्कुल वैसे ही जैसे किसी बच्चे को गोद में लेते हैं । पूछने पर तुमने कहा था 'मास्टरपीस' बना रही हो।  पता नहीं क्यों मुझसे ये देखा नहीं गया, और मैंने ज़िद कर दी कि "वापस करो मेरी स्लेट ..ये मेरी है... तुमने क्यों ली?" और ये कहते हुए मैंने अपनी ओर जोर से खींचा था। उस कोने से तुम्हारी हथेली थोड़ी कट भी गयी थी,शायद। और फिर गुस्से में तुमने सब कुछ मिटा डाला...जो लिखा था वो, और जो हम लिख सकते थे वो भी। हालाँकि जो था वो पूरी तरह मिट तो नहीं पाया और स्लेट भद्दी सी हो गयी थी...काले आसमान पर राख के तूफान सी। तब से लेकर आजतक उसपे कुछ लिखा नहीं मैंने और ना ही किसी और को लिखने दिया। कोई लिखता भी कैसे,मैंने इसे छुपा जो रखा था । वो स्लेट आज भी वैसी ही, थोड़ी सफेद,थोड़ी काली छोड़ी हुई है।  और सबकुछ 'काश' पे रुक गया है। काश! मैंने उस दिन तुम्हारा हाथ पकड़ लिया होता। काश! मैंने तुम्हें मिटाने नहीं दिया होता। काश! तुमने हल्के हाथों से मिटा...

सुनो न......

Image
  ये जो तुम हमेशा कहती हो की, हम तुम्हें समझते नहीं हैं, क्या तुम्हें सच में ऐसा लगता है? क्या तुम्हें नहीं लगता कि तुम्हें हमसे ज़्यादा कोई नहीं समझ सका...? अपना ग़म ज़ाहिर कर देना आसान है, मुश्किल है तो उस ग़म को भीतर छुपा के रखना, तुम तो सबकुछ कह देती हो, ग़ुस्सा आए तो बात भी ना करती हो, गुस्से मे आखें भी दिखाती हो 😌मगर हम क्या करें? जब गुस्सा करती हो तो मैं सहेम सा जाता हूँ,   "बात बात पर झगड़ता नहीं हूं ।" तो कैसे ज़ाहिर करें ख़ुद को! तुम्हारा एक छोटा सा सेंटिमेंटल मैसेज आता है, और हमारी पूरी रात सिर्फ़ करवटें बदलने में बीत जाती है... मगर हम उसका जवाब नहीं देते हैं, जानती हो क्यों? फिर तुम्हारा सर दर्द होगा तुम्हारा तबियत ख़राब हो जाता है । और हमसे नहीं देखी जाता तुम्हारा सर दर्द ओर तुम्हे बीमार, तो क्या करू? कभी -कभी हमारा भी मन करता है कि भाग चलें तुम्हारे संग कहीं दूर, इतनी दूर जहाँ हम भी सड़कों पर नाच सके! इतनी दूर जहाँ हम तुम्हारे साथ गोलगप्पे खा सके! इतनी दूर जहाँ हम तुम्हारे कांधे पर सिर रख के चंद पल बिता सके ! इतनी दूर जहाँ हम तुम्हें बता सके की ये रूड बिहेवियर, ये ईगो म...

निष्ठुर ...

Image
––– ट्रेन में समय गुजारने के लिए बगल में बैठे अधेड़ से बात करना शुरु किया नीति ने " आप कहाँ तक जाएंगे अंकल। "  " इलाहाबाद तक । "  उसने ठिठोली की " कुंभ लगने में तो अभी बहुत टाइम है । "  " वहीं तट पर इंतजार करेंगे कुंभ का, बेटी ब्याह लिए , अब तो जीवन में कुंभ नहाना ही रह गया है । "  " अच्छा परिवार में कौन कौन है । " " कोई नहीं बस बेटी थी पिछले हफ्ते उसका ब्याह कर दिया । " " अच्छा ! दामाद क्या करता है । " " उ हमरे बेटी से पियार करता है । "  कहते हुए उसने आंखें पंखे पर टिका दी । थोड़ी देर की चुप्पी के बाद जब नीति ने उसके कंधे पर हाथ रखकर धीरे से कहा " दुख बांटने से कम होता है अंकल " तो मानों भाखडा बांध के चौबीसो गेट एक साथ खुल गए । थोडा संयत होने के बाद उसने बताया " बेटी ने कहा अगर उससे शादी नहीं हुई तो जहर खा लेगी । बिन मां की बच्ची थी उसकी खुशी के लिए सबकुछ जानते हुए भी मैंने हां कह दी  और पूरे धूमधाम से शादी की व्यवस्था में जुट गया जो कुछ मेरे पास था सब गहने जेवर आवभगत की तैयारियों में लगा दिया...

गोल गप्पे ...

Image
  तेज बरसात और चप्पल टूट गयी है सामने राजू मोची का बोर्ड है राहत  की सांस लेती हूँ चप्पल सिल गयी है कितना हुआ ? बोलता नहीं..  मेरी ओर देखता है शरमाया सा धीरे से कहता है गोलगप्पे खिला देंगी पैसे तो दीदी ले लेती है.. मान जाती हूँ दस बारह साल का राजू खुश हो जाता है .. अब जब भी उधर से गुजरती हूँ बहाने से थमती हूँ और हम दोनों बाते करते है   गोलगप्पे भी खाते है अब हम  दोस्त है तरह तरह के सवाल पूछता है पढ़ना  चाहता है ... एक शाम उसकी बातें रोक कर बताती हूँ दो दिन बाद जा रही हूँ अपने बेटे के पास .. साल भर बाद ही वापिस आना होगा ये भी की कल मेरा जन्म दिन है जो मनाती नहीं हूँ ... घर आ जाती हूँ जन्मदिन की सुबह .. अखबार में लिपटी गिफ्ट दरवाजे से देकर झट चला जाता है   हरे रंग की सूती साड़ी है .. पहनती हूँ .. उसकी सिली चप्पल भी . चल देती हूँ . दुकान पर चुपचाप बैठा है मुझे देखते ही पास आता है हंसता है .. तारीफ़ करता है तुमने कैसे जाना मेरी पसंद का रंग ? पूछती हूँ .. “ माँ को यही रंग अच्छा लगता था “  पानी बरस रहा है हम दोनों के चेहरे भीगे है मालूम नहीं  बरसात है...

चार मिले चौंसठ खिले ....

Image
  "चार मिले चौंसठ खिले, बीस रहे कर जोड़! प्रेमी सज्जन दो मिले, खिल गए सात करोड़!!" मुझसे एक बुजुर्गवार ने इस कहावत का अर्थ पूछा, काफी सोच- विचार के बाद भी जब मैं बता नहीं पाया, तो मैंने कहा – "बाबा आप ही बताइए, मेरी समझ में तो कुछ नहीं आ रहा !" तब एक रहस्यमयी मुस्कान के साथ बाबा समझाने लगे – "देखो बेटे, यह बड़े रहस्य की बात है... चार मिले – मतलब जब भी कोई मिलता है, तो सबसे पहले आपस में दोनों की आंखें मिलती हैं, इसलिए कहा, चार मिले ! फिर कहा, चौसठ खिले, यानि दोनों के बत्तीस-बत्तीस दांत – कुल मिलाकर चौंसठ हो गए, इस तरह “चार मिले, चौंसठ खिले” हुआ! “बीस रहे कर जोड़” – दोनों हाथों की दस उंगलियां – दोनों व्यक्तियों की 20 हुईं – बीसों मिलकर ही एक, दूसरे को प्रणाम की मुद्रा में हाथ बरबस उठ ही जाते हैं!" “प्रेमी सज्जन दो मिले” – जब दो आत्मीय जन मिलें – यह बड़े रहस्य की बात है – क्योंकि मिलने वालों में आत्मीयता नहीं हुई तो “न बीस रहे कर जोड़” होगा और न "चौंसठ खिलेंगे” उन्होंने आगे कहा, "वैसे तो शरीर में रोम की गिनती करना असम्भव है, लेकिन मोटा-मोटा साढ़े तीन करोड़ ...

पिता का आशीर्वाद ....

Image
  एक व्यापारी की यह सत्य घटना है। जब मृत्यु का समय सन्निकट आया तो पिता ने अपने एकमात्र पुत्र धनपाल को बुलाकर कहा कि.. बेटा मेरे पास धनसंपत्ति नहीं है कि मैं तुम्हें विरासत में दूं। पर मैंने जीवनभर सच्चाई और प्रामाणिकता से काम किया है। तो मैं तुम्हें आशीर्वाद देता हूं कि, तुम जीवन में बहुत सुखी रहोगे और धूल को भी हाथ लगाओगे तो वह सोना बन जायेगी। बेटे ने सिर झुकाकर पिताजी के पैर छुए। पिता ने सिर पर हाथ रखकर आशीर्वाद दिया और संतोष से अपने प्राण त्याग कर दिए। अब घर का खर्च बेटे धनपाल को संभालना था। उसने एक छोटी सी ठेला गाड़ी पर अपना व्यापार शुरू किया। धीरे धीरे व्यापार बढ़ने लगा। एक छोटी सी दुकान ले ली। व्यापार और बढ़ा। अब नगर के संपन्न लोगों में उसकी गिनती होने लगी। उसको विश्वास था कि यह सब मेरे पिता के आशीर्वाद का ही फल है। क्योंकि, उन्होंने जीवन में दु:ख उठाया, पर कभी धैर्य नहीं छोड़ा, श्रद्धा नहीं छोड़ी, प्रामाणिकता नहीं छोड़ी इसलिए उनकी वाणी में बल था। और उनके आशीर्वाद फलीभूत हुए। और मैं सुखी हुआ। उसके मुंह से बारबार यह बात निकलती थी। एक दिन एक मित्र ने पूछा: तुम्हारे पिता में इतन...